सेवा के बढ़ते कदम…..माई की रसोई (मैहर) में

रोटी, कपड़ा और मकान को आम तौर पर किसी व्यक्ति या कुटुंब की मौलिक जरूरत माना जाता है | निरपेक्ष न्याय, सुलभ चिकित्सा और सामाजिक सुरक्षा हमारी जरूरतों का अगला सोपान होता है, जिसकी उपलब्धता हमें सभ्य, सुसंस्कृत समाज का नागरिक बनाती है | हम इंसानों के इस धरती पर सर्वश्रेष्ठ जीव के रूप में शासन करते हज़ारों वर्ष बीत जाने के बाद भी समाज में असमानता की खाई सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती ही जा रही है, लेकिन सीमित संसाधन से भी दुनिया में सकारात्मक बदलाव लाने का सपना देखने वाले मतवाले निरंतर इस खाई को पाटने के छोटे-बड़े हनुमत् प्रयासों में लगे रहते हैं |

समान प्रवृत्ति वाले लोग एक दूसरे के प्रति अनायास आकर्षित होते हैं, इसलिए जब हमें माँ के दरबार में मत्था टेकने जाने वाले हज़ारों लोगों को रोज निःशुल्क भोजन और विश्रामालय उपलब्ध कराने वाली *माई की रसोई* के बारे में पता चला, तब हम लोग भी एक चिकित्सकीय टीम और जरूरी दवाएं ले कर निकल पड़े पुण्य की उस गंगा में छोटा सा एक अर्पण करने | *टीम प्रमिला हॉस्पिटल* पहले भी समाज के सर्वहारा वर्ग की सेवा में इस तरह के अनगिनत मेडिकल कैंप आयोजित करने का अनुभवी रहा है, लेकिन पहली बार हम लोग अंतर्राज्यीय यात्रा में निकले थे | टीम के सभी सदस्य उत्साहित भी थे, कौतुक भी | हम गंगा किनारे वाले माँ नर्मदा की गोद में जाने को बेताब थे | प्यार से बोली गयी दो बोली और सत्कार से खिलाई दो रोटियां लम्बे सफ़र की सारी थकान मिटाने कि शक्ति रखती है | मैहर पहुँचने पर हमारी टीम का पारंपरिक स्वागत हुआ, जिससे हमारा उत्साह दोगुना हो गया | माई की रसोई में अन्य भक्तों के साथ सात्विक और सुस्वादु भोजन करने के बाद पूरी टीम निःशुल्क मेडिकल कैंप के आयोजन में लग गयी | थोड़ी ही देर में स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं की भीड़ लग गयी | समय कैसे बीता, पता ही नहीं चला |

शाम के समय माँ शारदा के चरणों में अपनी भक्ति का निवेदन कर और माँ का महाप्रसाद ग्रहण कर हम अगले दिन के सूर्योदय का इंतज़ार करने लगे | अगले दिन फिर सिलसिला चला निःशुल्क परामर्श और औषधि वितरण का | जनता जनार्दन का हमें अपार स्नेह मिला, कई शुभाकांक्षियों ने हमे अमूल्य सुझाव दिए |


दीन-दुखियारों की सेवा एक अनंत यात्रा है, जिसकी माई की रसोई एक अद्भुत मिसाल है और इस महाभियान में प्रमिला हॉस्पिटल की टीम को एक लघु अंश ग्रहण का अवसर मिलने पर गर्व है | मैहर से निकलते वक़्त हम संतानों ने नम आँखों से जगन्माता का जयकारा लगाया और मन में बहुत सारे यादगार लम्हे वापसी की यात्रा आरम्भ की | पूरी यात्रा की प्राप्ति रही – अनुभव का एक पिटारा, मैहर की पुण्यभूमि पर नर की नारायण के रूप में सेवा करने का सौभाग्य, माँ के आंचल में बिताए कुछ पल और अगली बार और ज्यादा तैयारी के साथ आने का संकल्प |

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